Inhalts-Übersicht
| Seite | ||
| Vorbemerkung | [11] | |
| François Villon: | ||
| Aus dem großen Testament | [13] | |
| Clément Marot: | ||
| Lied | [19] | |
| An den König, als ich bestohlen wurde | [20] | |
| Pierre Corneille: | ||
| Stanzen | [25] | |
| Pierre-Jean de Béranger: | ||
| Meine Berufung | [27] | |
| Die Dachkammer | [28] | |
| Der alte Korporal | [30] | |
| Des Volkes Erinnerungen | [32] | |
| Gérard de Nerval: | ||
| Herren und Knechte | [35] | |
| Phantasie | [35] | |
| Laß mich | [36] | |
| Goldene Verse | [37] | |
| Alfred de Musset: | ||
| An Juana | [39] | |
| An Julie | [41] | |
| An Pepa | [42] | |
| Lilla | [43] | |
| Ballade an den Mond | [44] | |
| Dezembernacht | [50] | |
| An Frau M. | [54] | |
| Lebewohl | [55] | |
| Victor Hugo: | ||
| Der Abend des Sämanns | [56] | |
| Abend auf dem Meere | [57] | |
| Aus den Orientalen | [62] | |
| Der Kaisermantel | [64] | |
| Die Ordnung ist wieder hergestellt | [65] | |
| Lied | [67] | |
| Lied | [68] | |
| Ein Spiel | [69] | |
| Des Kaisers Zeitvertreib | [69] | |
| Die Sühne | [72] | |
| Théophile Gautier: | ||
| Pastell | [84] | |
| Trost | [85] | |
| Die Alten von der alten Garde | [86] | |
| Charles Baudelaire: | ||
| Mißgeschick | [91] | |
| Das Ideal | [92] | |
| Der Vampyr | [92] | |
| Die Katze | [93] | |
| Ganz und gar | [94] | |
| Nachmittagslied | [95] | |
| Das Gespenst | [97] | |
| Die Eulen | [98] | |
| Trauriges Madrigal | [99] | |
| Der Mahner | [100] | |
| Lösegeld | [101] | |
| Der Mensch und das Meer | [102] | |
| Klage eines Icarus | [103] | |
| Heauton timoroumenos | [103] | |
| Abel und Kain | [105] | |
| Nachschrift für ein verbotenes Buch | [106] | |
| Paul Verlaine: | ||
| An Eugen Carrière | [108] | |
| Nevermore | [109] | |
| Drei Jahre später | [109] | |
| Sentimentaler Spaziergang | [110] | |
| Herbstlied | [111] | |
| Schäferstunde | [111] | |
| Mondschein | [112] | |
| Auf dem Spaziergang | [113] | |
| Aufzug | [114] | |
| Der Faun | [115] | |
| Halblaut | [115] | |
| Sentimentales Zwiegespräch | [116] | |
| Frau und Katze | [117] | |
| Serenade | [118] | |
| Çavitri | [119] | |
| Guter Sang | ||
| I. | [120] | |
| II. | [121] | |
| III. | [121] | |
| Vergessene Weisen | ||
| I. | [122] | |
| II. | [123] | |
| Bilder aus Belgien | ||
| I. | Walcourt | [123] |
| II. | Charleroi | [124] |
| III. | Brüssel | [125] |
| IV. | Schloßpark | [126] |
| V. | Karussel | [126] |
| VI. | Mecheln | [127] |
| Aquarell von Spleen | [128] | |
| Weisheit | ||
| I. | [129] | |
| II. | Caspar Hauser | [130] |
| III. | [131] | |
| Prolog | [132] | |
| Pierrot | [133] | |
| Die Kunst des Dichters | [133] | |
| Schlaff | [135] | |
| Liebe | [136] | |
| Allegorie | [137] | |
| Hirngespinste | ||
| I. | [138] | |
| II. | [139] | |
| Der Schamlose | [140] | |
| Hände | [141] | |
| Närrischer Rat | [143] | |
| Lieder für sie | ||
| I. | [145] | |
| II. | [146] | |
| An König Ludwig den Zweiten | [148] | |
| Meine Büste | [149] | |
| José-Maria de Hérédia: | ||
| Vergessen | ||
| Pan | [150] | |
| Der Ziegenhirt | [151] | |
| Weihe | [152] | |
| Des Toten Bitte | [153] | |
| Der Sklave | [153] | |
| An der Trebia | [154] | |
| Nach der Schlacht bei Cannae | [155] | |
| Villula | [156] | |
| Tranquillus | [156] | |
| Lupercus | [157] | |
| Die Dogaressa | [158] | |
| Der alte Goldschmied | [159] | |
| Die Conquistadoren | [159] | |
| Jungbrunnen | [160] | |
| Auf eine tote Stadt | [161] | |
| Antike Medaille | [161] | |
| Bretagne | [162] | |
| Maris stella | [163] | |
| An Ernesto Rossi | [164] | |
| Jacques Normand: | ||
| Nach dem Essen | [165] | |
| Taubenschießen | [169] | |
| Aufrichtig | [171] | |
| Um den Ruhm | [172] | |
| Jean Richepin: | ||
| Unsere Vergnügungen | [173] | |
| Unsere Rache | [175] | |
| Mein Glas ist leer | [176] | |
| Moderne Studie nach der Antike | [178] | |
| Auf Wache | [179] | |
| Die Küste | [180] | |
| Trockene Kiesel | [182] | |
| Jean-Arthur Rimbaud: | ||
| Mein Zigeunerleben | [184] | |
| Lebenstiefe | [184] | |
| Faunskopf | [185] | |
| Aufregung | [185] | |
| Der Schläfer im Tal | [187] | |
| Der Schrank | [188] | |
| Jules Jouy: | ||
| Lied der Bergarbeiter | [189] | |
| Der bleiche Mann | [190] | |
| Emile Verhaeren: | ||
| Vlämische Kunst | [192] | |
| Artevelde | [195] | |
| Die Bauern | [196] | |
| Kato | [198] | |
| Des Mönches Tod | [200] | |
| Betrachtung | [202] | |
| Die Bäume | [203] | |
| Die Tränke | [204] | |
| Der Schrei | [204] | |
| Die Nacht | [205] | |
| Die Straßen | [206] | |
| Das Idol | [207] | |
| Unkraut | [208] | |
| Gebet | [209] | |
| Das Schwert | [210] | |
| Ein Abend | [211] | |
| Albert Giraud: | ||
| Katharina von Medici | [213] | |
| An eine vierzigjährige Frau | [214] | |
| Henri de Régnier: | ||
| Unsichtbare Gegenwart | [215] | |
| Vor der Prägung | [216] | |
| Wechselstrophen | [218] | |
| Ein Traum von Stunden und von Jahren | [220] | |
| Ein Traum von Morgenrot und Schatten | [222] | |
| Der Raufbold | [222] | |
| Chrysilla | [223] | |
| Fernand Gregh: | ||
| Prüfung | [225] | |
| Abend in der Großstadt | [227] | |
| Musik in der Ferne | [228] | |
| Zweifel | [230] | |
| Dämmerstunde | [231] | |
| Betrachtung | [232] | |
Vorbemerkung.
In dieser Sammlung ist der Grundsatz genauer Nachbildung von Versmaß und Reimverschlingung streng durchgeführt. Wer Übersetzungen eine Mitgift aus eigenem geben kann, mag sich freier bewegen; der bescheidene Dolmetsch soll die Gebärde des Kunstwerks ehren und deshalb den Vorteil verwandter Formen selbst auf die Gefahr einer gelinden Beengung ausnutzen. Es ist keineswegs richtig, daß Übersetzungen durchaus den Eindruck von Originalen machen müssen, der Geruch der Muttererde darf sich nicht verflüchtigen. Unsere Bühne kann den Trochaeus des spanischen Dramas, den Alexandriner des französischen getrost preisgeben, ihre Mittel leisten tausendfältigen Ersatz und ermöglichen Treue der Stimmung; die redlichste Übertragung eines Gedichtes hat dagegen immer noch genug Verluste zu beklagen. Gewiß wird alle Lyrik durch dieselben Stimmungen ausgelöst, doch die Seelen der Völker und Zeiten sind so verschieden, wie die der Sprachen.
Der Leitsatz rechtfertigt die Verwendung des oft verketzerten Alexandriners. Was ihn uns unbehaglich macht, ist zumeist die starre Cäsur, die ihn im Deutschen — viel schärfer als im Französischen — wie mit einem Beilschlage zerhackt; sie ist frei behandelt, wie dies ja auch die jüngeren Franzosen belieben.
Dem vers libre ist peinliche Gerechtigkeit widerfahren; Meister wie Régnier und Verhaeren können dies beanspruchen, sie sind gegen den Verdacht gespreizter Unfähigkeit geschützt, die sich nur zu oft solcher Tracht bedient.
Es bedarf keiner Erwähnung, daß das Büchlein weder bestimmte Zeitabschnitte noch Schulen erschöpfen will; nicht einmal dem Reichtum der vertretenen Dichter wird es auch nur annähernd gerecht.